यूं तो मुझे घर और ऑफिस के चक्कर मे हमेशा ही हड़बड़ी होती रहती है | पर ये क्या हो रहा है ..... जो पिछले दिनो मैंने ऑफिस या बाज़ार आते जाते , दीवारों पर /दुकानों के साइन बोर्ड / या किसी सूचना पट पर लिखे हिन्दी वाक्यो को कुछ इस तरह से पढ़ लिया | जबकि वहाँ लिखा था –
“अनाउंसमेंट कक्ष”
“महांकाल एनटरप्राइजेज़”
“सदी की सबसे बड़ी क्रान्ति”
“यहाँ विज्ञापन ना चिपकाए – आदेशानुसार”
कल मेरे कज़ीन ने एक ई–मेल फारवर्ड की |इस मेल ने कुछ सोचने पर विवश कर दिया| दिल को छू लेने वाली इस रचना को अपने ब्लॉग पर शेयर कर रही हूँ –
“ “ “.... जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी...
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वोह रास्ता, क्या क्या नहीं था वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दूकान, बर्फ केगोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" है, फिर भी सब सूना है... शायद अब दुनिया सिमट रही है...
जब मैं छोटा था, शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी...
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उड़ा करता था , वो लम्बी "साइकिल रेस", वो बचपन के खेल, वो हर शाम थकके चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है... शायद वक्त सिमट रहा है...
जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी...
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना, लड़कियों की बातें, वो साथ रोना, अब भी मेरे कईदोस्त है,
पर दोस्ती जाने कहाँ है, जब भी "ट्रेफिक सिग्नल" पे मिलते है "हाई" करते है, और अपने अपने रस्ते चल देते है,
होली, दिवाली, जन्मदिन, नए साल पर बस SMS आ जाते है... शायद अब रिश्ते बदल रहे है...
जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगड़ी टांग, पोषम पा, कट थे केक, टिपि टिपि टाप,
अब इन्टरनेट, ऑफिस, फिल्म्स से फुरसत हई नहीं मिलती... शायद ज़िन्दगी बदल रही है...
ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच यही है... जो अक्सर कबरिस्तान के बहार बोर्ड पर लिखा होता है,
"मंजिल तो यही थी, बस ज़िन्दगी गुज़र गयी मेरे यहाँ आते आते"...
ज़िन्दगी का लम्हा बहुत छोटा सा है,
कल की कोई बुनियाद नहीं है...
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है...
अब बच गए इस पल में...
तमन्नाओं से भरी इस ज़िन्दगी में हम सिर्फ भाग रहे है... इस ज़िन्दगी को जीयो ना कि काटो... “ “ “
नया साल आने को है | उम्मीद है कि नया साल सभी के लिए आशाओ से भरा और उमंगों से जगमग होगा |
डियर ब्लॉग – बिलेटेड हैप्पी बर्थ दे टू यू !!!!
ब्लॉग का पहला बर्थ डे 9 दिसंबर को निकल गया और मुझे अब ध्यान आया |
डियर ब्लॉग , देर से ही सही , ... जनम दिन मुबारक ।
इस अवसर पर ब्लॉग को नया कलेवर देना ही है |
तीन चार दिनों तक ढेरो टेम्पलेट्स खोजने की कवायद करते हुए एक डिजाइन पसंद आया और इसके ले आउट मे छोटे मोटे बदलाव करने के बाद , लो जी... मेरा ब्लॉग नए रूप मे प्रस्तुत है |
खिले चटख रंग, फूल , तितलिया , मेरे मन को भा गए है |
डियर ब्लॉग जी .... तुम जियो हजारो साल , साल के दिन हो पचास हजार |
हिन्दी ब्लॉग जगत से मेरा जुड़ाव यहीं कुछ छ: आठ महीनों से है | और , पिछले लग-भग चार महीनों से अपने ब्लॉग पर कुछ भी नहीं लिख पायी हूँ | लेकिन आज कुछ ऐसा हुआ की लिखने को विवश होना पड़ा |
आज क्षमा जी की टिप्पणी आयी - ये कहते हुए कि, उनके ब्लॉग पर मैंने जो टिप्पणियाँ की है उसके लिए वे शुक्र गुज़ार है |
क्षमा जी के ब्लॉग के बारे मे यहाँ कुछ कहना चाहती हूँ –
हिन्दी ब्लॉग जगत मे surfing करते हुए मैं भिन्न भिन्न हिन्दी ब्लॉग देखती /पढ़ती रहीं हूँ | ये सभी ब्लॉग कविताए ,कहानियाँ , यात्रा संस्मरण , आने जाने वाले मौसमों एवं त्यौहारों के बारे मे लेख , दैनिक जीवन के अनुभवो से भरे पड़े है |
एक ब्लॉग पढ़ा और अगले पर बढ़ गए |
लेकिन क्षमा जी के ब्लॉग (क्षमा – बिखरे सितारे ) ने मेरे मन मानस पर ऐसा प्रभाव डाला कि पहली बार पढ़ने मे ही इससे मै बंध सी गई | पूजा की कहानी बड़ी ही thought provoking ( हिन्दी शब्द सूझ नही रहा है ) लगी | कहानी की अगली पोस्ट का हमेशा इंतज़ार रहता था |अलग अलग एपिसोड्स पर मैंने टिप्पणियाँ भी भेजी , और इन्ही मे से एक टिप्पणी पर क्षमा जी का response आया कि पात्रों के नाम, स्थान जो भी हो, ये तो एक सच्ची कहानी है |
My God…..! कोई पति इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ? कोई पत्नी इतनी सहनशील कैसे हो सकती है ? मेरा विद्रोही मन कहने लगा कि ,पूजा को तुरंत अपने पति से अलग हो जाना चाहिए तभी उसकी अकल ठीकाने आएगी ! परंतु यह भी सही है कि जिस पर बीत रही है ,वो अपने आप को परिस्थिती के अनुसार ढालता चला जाता है |पूजा ने यही किया !!!
क्षमा जी, टिप्पणियों के लिए शुक्र गुजारी क्यूँ ?
उत्कृष्ट लेखन के लिए बारम्बार साधुवाद !
आप लिखें ,खूब लिखें और लिखते रहें ......
इन दिनो , दिन कैसे सरपट भाग रहे है ।मानो एक के बाद एक घटित होते घटनाक्रम, थमने, ठहरने, समझने के लिये अंतराल ही नही । फास्ट एकशन मूवी की तरह ।
हर साल की तरह इस बार भी हम सरकारी लोगो को मार्च फीवर/सिंड्रोम से दो –चार होना पड रहा है ।
# मार्च फीवर यानी सरकारी ऑफिसो मे इयर एंडिंग के काम का निपटान , कट ऑफ डेट तक बजट टारगेट पूरा करने की भाग दौड। उपर से यदि विधान सभा सत्र चल रहा हो तो मंत्रालय के कर्मचारी/अधिकारियों की शक्लो- सूरत और आपाधापी देखते ही बनती है ।
किसी ग्रंथ के किसी श्र्लोक का अनुवाद सादर प्रस्तुत -
“सरकारी प्राणी काम तो खूब करते है(???....), ये अलग बात है कि इस काम के दर्शन सिर्फ कागज़ों पर ही होते है ।“
# मार्च फीवर यानी इनकम टेक्स का टेंशन , टेक्स बचाने के लिये इंवेस्टमेंट की जुगत ।
पिछले कुछ सालो मे मै इनकम टेक्स के गूढ रहस्यो को अच्छा खासा (या...थोडा बहुत ) समझने लगी हू ।मुझे समझ आ गया है कि, कुल मिला कर –
इधर कुआँ उधर खाई , इधर इनकम टेक्स उधर महंगाई !!!
बच सको तो बच लो –very challenging job !!
# मार्च फीवर यानी बच्चों के फाइनल एक्ज़ाम,
यूं तो मार्च फीवर ,फरवरी के अंतिम सप्ताह से ही शुरू होने लगता है ।
सीबीएसइ के स्कूलों मे बच्चों के फिनल एक्ज़ाम फरवरी के अंतिम सप्ताह से शुरू हो जाते है और मार्च के आधे गुज़रते तक परीक्षाए खतम्। इन दिनो बच्चों को कुछ extra attention देना पडा ।
खान पान ,पढने खेलने का समय , बदलते मौसम के तेवर से बचाव , सभी कुछ सम्भालने की कामयाब कवायद कर डाली ।Thank god ,सब ठीक ठाक रहा।
अभी बस इतना ही । अगली पोस्ट जल्दी ही लिखना चाहती हूँ।