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शनिवार, 6 जून 2020

प्रक्रुति और मानव



नदियां धरती तुझे बुलाती ।
दुनियदारी नही सुहाती 

 -बचपन एक दुनिया थी 
दुनियादारी कोसो दूर थी
हसी ठीठोली, रुठ मनाती  ।

-खुला पंछी कब नभ मे रुका है 
कह देने से क्या पर्बत झुका है ।

-नदी ने कब रस्ता बदला है
देखो तो ..पल पल कैसे मानव बदला है ।

अब तो होना चाहिये बस
धरती संग राग रंग और रस ।

सम्भल ले अब तो, 
बदल ले खुद को 
छोड कृत्रिम जग , कर कुछ मनन
धरती संग हो जा मगन।




शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

शब्द मेरे ........


क्या रह गया है अब मेरे पास ,
                         मात्र शब्द मेरे

कभी टूट जाते है ,
कभी बिखर जाते है ,
             कभी गुनगुनाते है , शब्द मेरे

क्या होगा मेरा
अगर किसी ने छीन लिए ,
कभी कभी कुछ भी नही
                  कह पाते है , शब्द मेरे

मुझे रुलाते है ,
मुझे हँसाते है ,
             मुझे समझाते है ,   शब्द मेरे

मन मेरा तेरा आभारी है ,
                            शब्द मेरे..... .

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

मन

मन बेचैन, मन चंचल
मन पागल, मन घायल
मन धरती, मन आकाश
मन नीर, मन ही कमल
मन हिरन और मन पंछी
मन बादल, मन बरसात
मन है अलक, मन है पलक
मन दर्पण और मन अर्पण
मन कलरव मन नीरव
मन मौजी ....मन मौजी

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

जीवन- नीत नयी परिभाषा

जीवन- नित नयी परिभाषा
कुछ पाने की आशा
कुछ करने की ललक,
यकायक अन्धेरे मे सितारों की झलक,
कभी नम है आंखे,भीगी है पलक,
कभी कडवी बांते ,कभी मीठा बताशा
जीवन – नित नयी परिभाषा....